Author: Varsha Rani Tirkey
रोडवेज बस थी। बस में चढ़ने और सीट पर बैठने के कà¥à¤°à¤® में जिस चीज नजर गई और नजरिठमें बदल गई, वो था – डà¥à¤°à¤¾à¤‡à¤µà¤° की सीट के ठीक पीछे à¤à¤• रसà¥à¤¸à¥€ पर टंगा पà¥à¤°à¥à¤· अंडवियर। परेशानी वाली बात नहीं है। बस का डà¥à¤°à¤¾à¤‡à¤µà¤° सà¥à¤¬à¤¹ काम से पहले नहाया धोया होगा और अंडरवियर सूखने के लिà¤, जो à¤à¤•मातà¥à¤° जगह उसके पास थी, वहां डाल दिया। अब अगर à¤à¤• पल को सोचें कि à¤à¤¸à¥€ ही किसी सारà¥à¤µà¤œà¤¨à¤¿à¤• जगह पर अगर सà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ अंडरवियर लटका दिखे, तब à¤à¥€ कà¥à¤¯à¤¾ मामला इतना ही सामानà¥à¤¯ होता। नहीं ना! चलिठफिर ‘महिला दिवस’ की शà¥à¤à¤•ामनाà¤à¤‚।
सोमवार की सà¥à¤¬à¤¹ काम पर जाने के लिठरोडवेज की बस पकड़ी थी। रासà¥à¤¤à¥‡ में जब बस à¤à¤• कसà¥à¤¬à¥‡ के पड़ाव अडà¥à¤¡à¥‡ पर सवारियों के उतरने चढ़ने के लिठरà¥à¤•ी तो मेरी बगल की सीट पर बैठी महिला मà¥à¤à¥‡ अपने सामान का धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ रखने का कहकर नीचे उतर गई। à¤à¤• मिनट बाद जब वो वापस सीट पर आई, तो मैंने पूछा, ‘यहां पर टायलेट है कà¥à¤¯à¤¾?’ मैंने अंदाजा लगाया था कि वो टायलेट के लिठबस से नीचे उतरी होंगी। अपनी सीट पर बैठते हà¥à¤ वो मà¥à¤à¤¸à¥‡ बोलीं, ‘नहीं बहन… तड़के 4 बजे के बस में बैठे हà¥à¤ हैं और दोपहर तक घर पहà¥à¤‚चेंगे, कà¥à¤¯à¤¾ करते, कहीं तो जाना पड़ता।’ बोल वो रहीं थीं और लग रहा था जजà¥à¤¬à¤¾à¤¤ मेरे बयां हो रहे थे। मैं बस से यातà¥à¤°à¤¾ के दौरान पानी पीने से घबराती हूं। अरे चलता है यार, थोड़ा डिहाइडà¥à¤°à¥‡à¤Ÿ हो गठतो कोई बात नहीं, लेकिन यातà¥à¤°à¤¾ के बीच में टायलेट जाने की जरूरत आन पड़ी तो à¤à¤—वान ही मालिक है।
à¤à¤• बार सफर में तबियत ठीक नहीं लगने पर मैंने पानी पी लिया और फिर वही हà¥à¤† जो होना था। खà¥à¤¦à¤¾-खà¥à¤¦à¤¾ करते जब à¤à¤• बस अडà¥à¤¡à¥‡ पर सारà¥à¤µà¤œà¤¨à¤¿à¤• शौचालय दिखा तो लगा जैसे, यहीं चार कदम पर सà¥à¤µà¤°à¥à¤— है। बस से कूद कर गिरते-पड़ते à¤à¤¾à¤—ते हà¥à¤ जब शौचालय तक पहà¥à¤‚ची तो पाया कि मेरे उस कà¥à¤·à¤£à¤¿à¤• सà¥à¤µà¤°à¥à¤— के दरवाजों पर ताले पड़े थे। à¤à¤• अकेला जो खà¥à¤²à¤¾ था, उसकी हालत देखकर मà¥à¤à¥‡ समठनहीं आया कि मà¥à¤à¥‡ तेज पेशाब आया है या उलà¥à¤Ÿà¥€ आई है।
अपने काम के दौरान गांवो के दौरे में मैंने लोगों के मकानों के साथ सरकारी शौचालय बने देखे हैं, जिनपर जाने कà¥à¤¯à¥‚ं लिखा है, ’इजà¥à¤œà¤¤ घर‘। खैर मान लिया कि शौचालय माने इजà¥à¤œà¤¤ घर तो फिर इजà¥à¤œà¤¤ सिरà¥à¤« अपने मकान के दायरे में कà¥à¤¯à¥‚à¤? घर से बाहर, सारà¥à¤µà¤œà¤¨à¤¿à¤• सà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥‹à¤‚ पर इजà¥à¤œà¤¤ के सवाल का कà¥à¤¯à¤¾?
हम हर साल महिला दिवस मनाते हैं, महिलाओं की तरकà¥à¤•ी पर गरà¥à¤µ करते हैं और देश के विकास में योगदान देने के लिठउतà¥à¤¸à¤¾à¤¹à¤¿à¤¤ करते हैं, लेकिन किस कीमत पर?
सामाजिक संसà¥à¤¥à¤¾ à¤à¤•à¥à¤¶à¤¨à¤à¤¡ इंडिया दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ साल 2016 में दिलà¥à¤²à¥€ के सारà¥à¤µà¤œà¤¨à¤¿à¤• शौचालयों की सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ पर किठगठसरà¥à¤µà¥‡ के अनà¥à¤¸à¤¾à¤°, हर तीन में से à¤à¤• या à¤à¤• से जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ सारà¥à¤µà¤œà¤¨à¤¿à¤• शौचालयों में महिलाओं के लिठअलग शौचालय की वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ नहीं है। महिलाओं के लिठअलग शौचालय की सà¥à¤µà¤¿à¤§à¤¾ की बात हो तो जहां यह सà¥à¤µà¤¿à¤§à¤¾ है à¤à¥€ वहां साफ सफाई, पानी, बिजली, दरवाजे पर कà¥à¤‚डी ठीक नहीं है। à¤à¤• à¤à¤¸à¥‡ समाज में रहते हà¥à¤, जहां महिलाओं के लिठतय किया हà¥à¤† है कि उनकी जगह कहां है और उस जगह पर उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ करना कà¥à¤¯à¤¾ है, यह सोचने वाली बात है कि हम अपने शहरों में, गांवों में सारà¥à¤µà¤œà¤¨à¤¿à¤• जगहों पर महिलाओं की जरूरतों को दरकिनार कर देते हैं।
जब राषà¥à¤Ÿà¥à¤°à¥€à¤¯ राजधानी दिलà¥à¤²à¥€ तक में महिलाओं के लिठउचित सà¥à¤µà¤¿à¤§à¤¾à¤à¤‚ मà¥à¤¹à¥ˆà¤¯à¤¾ नहीं हैं, जिनकी वो हकदार हैं, तो देश के कसà¥à¤¬à¥‹à¤‚ और गांवों के हालातों का हम अंदाजा लगा ही सकते हैं। अंदाजा लगाना à¤à¥€ अगर मà¥à¤¶à¥à¤•िल लगे, तो मà¥à¤¶à¥à¤•िलों का रोना रोते मेरे जैसे कई उदाहरण मिल जाà¤à¤‚गे। हम हर साल महिला दिवस मनाते हैं, महिलाओं की तरकà¥à¤•ी पर गरà¥à¤µ करते हैं, उनसे पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤¿à¤¤ होते हैं, शहरों और गांवों हर जगह से महिलाओं को आगे आने, घर से निकलने, अचà¥à¤›à¥€ शिकà¥à¤·à¤¾ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करने, नौकरी करने, परिवार, समाज और, देश के विकास में योगदान देने के लिठउतà¥à¤¸à¤¾à¤¹à¤¿à¤¤ करते हैं, लेकिन किस कीमत पर? महिलाओं के सà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥à¤¥à¥à¤¯, उनकी सà¥à¤°à¤•à¥à¤·à¤¾ का कà¥à¤¯à¤¾? कà¥à¤¯à¤¾ इन सब मà¥à¤¦à¥à¤¦à¥‹à¤‚ पर हमें विचार और काम नहीं करना चाहिà¤, अगर हम सच में चाहते हैं कि महिलाà¤à¤‚ पढ़ें, बढ़ें, सशकà¥à¤¤ बनें, आतà¥à¤®à¤¨à¤¿à¤°à¥à¤à¤° बनें और सफलता की ऊंचाइयों पर पहà¥à¤‚चे।
Disclaimer: The article has been initially published on Feminism in India. Views expressed in the article are of the author’s.
नोट: यह आरà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ल मूल रूप से फेमिनिजà¥à¤® इन इंडिया हिंदी में पà¥à¤°à¤•ाशित किया गया है. आरà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ल में वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤ विचार लेखिका के हैं.
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